महिला सुरक्षा

हर एक महिला की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए

महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं

 



गलत नियत वालों को मौका और नहीं अब और नहीं

महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं अब और नहीं


जागो हे भारत की बेटियों अब तो नींद से जागो तुम

अपनी सुरक्षा परम लक्ष्य हो मन में गांठ ये बांधो तुम

प्यार के नाम पे जिस्म का सौदा और नहीं अब और नहीं


कभी जो देखो गलत निगाहें पहली बार में टोको तुम

छुए जो कोई गलत हाथ तो वहीं उसी पल रोको तुम

लापरवाही में फिर धोखा और नहीं अब और नहीं


गलत नियत वालों को मौका और नहीं अब और नहीं

महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं अब और नहीं

लेखक : राज कुमार

कोलकाता केस पर सरकार मौन

 


कोलकाता में हुए महिला ट्रेनी डाक्टर के रेप और मर्डर मामले में लगभग बीस दिन होने को हैं लेकिन अभी तक सीबीआई और पुलिस के हाथों में कोई पुख्ता सुबूत नहीं लगा है जिससे अपराधियों तक पहुंचा जा सके। सिर्फ एक अपराधी पकडा गया है संजय राय लेकिन फारेंसिक रिपोर्ट के अनुसार रेप करने वाले एक से अधिक लोग हैं। अब संजय राय को मोहरा बनाया गया है या फिर वाकई में संजय ने अकेले इस अपराध को अंजाम दिया है अभी कुछ भी साफ नहीं हो पाया है। इस मामले को लेकर लगातार राजनीतिक पार्टियों में बयानबाजी हो रही है। मामला इतना लम्बा खिंच रहा है और सीबीआई जैसी जांच एजेंसी को भी इसमें सफलता नहीं मिल पा रही है तो जाहिर है कि इसमें बडे और पावरफुल लोगों का हाथ है। 

गौरतलब है कि घटना के बारे में पुलिस को बहुत देरी से खबर की गई और घटनास्थल पर सबूतों से छेडछाड की गई जो यह साबित करता है कि बहुत कुछ गडबड है। ये तो हाल है इतने हाईफाई केस का तो आप सोचिए जरा कि छोटे और कमजोर गरीब लोगों के साथ जब इस तरह के अपराध होते होंगे तो उन्हें कैसे इंसाफ मिल पाता होगा, मिलता ही नहीं होगा और अपराधी बेखौफ एक दूसरा अपराध करने के लिए तैयारी करने लगते हैं। क्या अब सरकार महिलाओं की सुरक्षा करने में असफल हो रही है? क्या महिलाओं को अब न्याय की उम्मीद छोड देनी चाहिए ? ये बडा सवाल है। आजकल लोगों के अंदर डर का माहौल है और लोग अपनी बेटियों को बाहर भेजने से भी डर रहे हैं कि कहीं उनके साथ कोई अप्रिय घटना न घट जाए। सोचिए ऐसे डर के माहौल में हमारी बहन बेटियाँ कैसे रहेगी । महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार को किस तरह के इंतजाम करने चाहिए आप कमेंट्स करके हमें जरूर बताइए और हाँ अपनी बहनों और बेटियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब आपको खुद लेनी होगी।

कोलकाता रेप केस अपडेट

 कोलकाता गैंगरेप के मामले में जिस तरह से राजनीति हो रही थी और केस को तोडा मरोडा जा रहा था उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है।सुप्रीम कोर्ट ने मामले को स्वतः संज्ञान में लेते हुए अपने पास बुला लिया है। 

अभी तक पुलिस ने महज एक इंसान संजय राय को गिरफ्तार किया है और उसने कुबूल भी किया है कि उसने अपराध किया है लेकिन जब जांच के बाद महिला डाक्टर के शरीर में 151 mg सीमेन मिला और प्रूफ हुआ कि इतना सीमेन एक आदमी का नहीं हो सकता तो जाहिर सी बात है कि रेप करने वाले एक से अधिक थे। इसका साफ मतलब है कि संजय राय झूठ बोल रहा है कि उसने यह अपराध अकेले किया है। इतना तो साफ है कि अपराधी बहुत पावरफुल है और शायद उसी के कहने पर संजय राय ने सारा इल्जाम अपने ऊपर ले लिया है। संजय झूठ बोल रहा है कि सच इसी को सामने लाने के लिए अब सीबीआई उसका लाई डिटेक्टर टेस्ट करने की तैयारी में है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने मामने को अपने अंडर में ले लिया है तो उम्मीद है कि मृत डाक्टर और उसके परिवार को इंसाफ जल्द से जल्द मिलेगा और अपराधी को सख्त से सख्त सजा मिलेगी।

महिला दिवस की बधाइयां



नारी और पुरूष इस संसार रूपी गाडी के दो पहिए के समान है । यदि संसार की इस गाडी के दोनों पहियों में से किसी एक को भी अलग कर दिया जाए तो संसार की कल्पना नहीं की जा सकती है। ऐसे में जरूरी है कि नारी और पुरूष दोनों को एकसमान हक और अधिकार मिले। अक्सर हमारे प्राचीन भारतीय समाज में देखा गया है कि पुरुषों को नारियों की तुलना में ज्यादा अधिकार और सम्मान मिले हैं लेकिन जैसे जैसे समाज आगे बढा है नारियों की दशा में सुधार हुए हैं । यदि कुछ मामलों को छोड दिया जाए तो आज के आधुनिक समाज में नारियां पुरूषों से किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है और ऐसा होना भी चाहिए।
आज अन्र्तराष्ट्रीय महिला दिवस है तो हम सब को चाहिए कि नारियों के सम्मान में कुछ न कुछ करने की पहल करें। यदि कुछ भी नहीं कर सकते तो कम से कम दूसरों के घरों की महिलाओं की इज्ज़त उसी तरह से करें जैसी अपने घर की महिलाओं की करते हैं। महिलाएं आगे बढ रही हैं लेकिन उन्हें समाज के प्रोत्साहन की जरूरत है हमारे सपोर्ट की जरूरत है जिससे उनका कभी हौसला न टूटे। तो आइए आज हम प्रण करते हैं कि किसी भी महिला के साथ कभी भी कोई दुर्व्यवहार नहीं करेंगे और न होने देंगे। उन्हें पूरी इज्ज़त देंगे और पूरा सम्मान करेंगे।

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर बधाइयां।

देर सही पर इंसाफ हुआ


निर्भया कांड मामले में देर से ही सही लेकिन इंसाफ मिल चुका है। दिल्ली की अदालत ने चारों आरोपियों को 22 जनवरी 2020 को सुबह सात बजे फाँसी पर लटकाने का आदेश जारी किया है। अदालत के इस फैसले से लोगों का अदालत और कानून पर थोडा विश्वास मजबूत होगा और उन मानसिक विकृति के लोगों में थोडा सा खौफ भी पैदा होगा जो लडकियों और छोटी बच्चियों पर हवस भरी गन्दी निगाह रखते हैं। 
आपको बता दें कि दिसंबर 2012 में एक 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा से 6 लोगों ने हैवानियत की हदें पार करते हुए सामूहिक दुष्कर्म करके उसे बुरी तरह घायल करके मरणासन्न अवस्था में सडक के किनारे फेंक दिया था। सभी आरोपियों में से एक आरोपी राम सिंह जेल में ही आत्महत्या कर चुका है जबकि एक आरोपी नाबालिग था जिसे तीन साल की सजा सुनाई गई थी जिसकी सजा पूरी हो चुकी है और उसे दिसंबर 2015  में रिहा भी किया जा चुका है। अब बाकी बचे चारों आरोपियों का भी डेथ वारंट जारी कर दिया गया है। हालांकि अपराधियों के पास अभी भी उपचारात्मक याचिका दायर करने का विकल्प  खुला हुआ है।
देश भर में लगातार बढ रही दुष्कर्म की घटनाओं को देखते हुए इन चारों आरोपियों की फाँसी एक सबक साबित हो सकती है। आरोपियों को पता चलना चाहिए कि औरतों और मासूम बच्चियों पर अब किसी भी तरह का अत्याचार बर्दाश्त नहीं हो सकेगा और हर आरोपी चाहे वह बडे रसूख वाला हो या कम, उसे कडी से कडी सजा मिलेगी। हम निर्भया को तो वापस नहीं ला सकते पर इस  फाँसी से पीडिता के परिवार और देश की जनता को थोड़ी सी शान्ति और राहत जरूर महसूस होगी। 
हम देश की हर महिला और बच्ची के लिए सुरक्षित माहौल की कामना करते हैं।

Photo source:Dainik jagran

बलात्कार: अब तो हद हो चुकी


भारत में बेटियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अब मन में सवाल गहरे हो रहे हैं। बलात्कारियों का हौसला इस कदर बढ चुका है कि वो अपराध करने से बाज नहीं आ रहे हैं। पहले दुष्कर्म करने के बाद पीडिता को जिन्दा छोड देते थे इसलिए कम से कम वो इंसाफ के लिए कानून का दरवाजा तो खटखटा सकती थी लेकिन अब तो हैवानियत इतनी बढ चुकी है कि बलात्कार तो करते ही हैं पीडिता को जला कर मार दे रहे हैं ताकि कोई सबूत न बचे। यह अपराध अब हत्या के अपराध से भी ज्यादा जघन्य और हैवानियत भरा हो चुका है। ये राक्षसी प्रवृत्ति के लोग आखिर कहां से आ गए हैं जो बेटियों को अपनी हवस का शिकार बना कर उनकी जिन्दगी छीन रहे हैं। 
सबसे बडी तकलीफ तब होती है जब पीडिता के पक्ष को कानून सुनना ही नहीं चाहता है। हर बार लगभग ऐसा ही होता है कि कोई बाप या भाई किसी लडकी के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज कराने जाता है तो पुलिस आनाकानी करती है और तरह तरह के तर्क देती है कि वह किसी के साथ भाग गई होगी .. आ जाएगी वगैरह वगैरह। अबे तेरे पास कोई मदद के लिए गया है तो उसकी मदद कर , रिपोर्ट दर्ज कर और तुरंत कार्यवाही कर , हो सकता किसी मासूम की जिन्दगी बच जाए। पुलिस की कामचोरी और घूसखोरी किसी से छुपी नहीं है। कई मामलों में तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि पीडिता के पहुँचने से पहले अपराधी ही थाने पहुँचकर नोटों के बण्डल पकडा देता है तो पुलिस अपने आप अंधी और बहरी हो जाती है न उसे कुछ सुनाई देता है न कुछ दिखाई देता है। 

हम सरकार से यही गुजारिश करना चाहते हैं कि पुलिस को यह आदेश हो कि लडकियों व औरतों के मामले में मामला  किसी भी क्षेत्र का हो और कैसा भी हो तुरंत एफआईआर दर्ज हो और त्वरित कार्यवाही शुरू हो। जैसा कि हैदराबाद वाले केस में हुआ कि पुलिस ने रिपोर्ट इसलिए दर्ज नहीं की क्योंकि मामला उनके क्षेत्र में नहीं आता है। अब यह बहानेबाजी बन्द होनी चाहिए और व्यवस्था ऐसी हो कि औरतों और बच्चियों के सम्बंध में जो भी नजदीकी पुलिस चौकी या थाना हो वहां पर बिना किसी सवाल के रिपोर्ट दर्ज हो और तुरंत एक्शन लिया जाए। पुलिस की थोडी सी सतर्कता किसी मासूम की जिन्दगी बचा सकती है।

नारी नारी को कब समझेगी



हम हमेशा नारी को सम्मान दिलाने की बात करते हैं  और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए प्रयासरत रहते हैं । आखिर लोग बेटियों से इतनी नफरत क्यों करते हैं समझ में नहीं आता। चलिए मान लिया कि पुरुषों को बेटों की चाहत होती है जिसकी वजह से वे औरतों पर भ्रूणहत्या के लिए दबाव बनाते हैं लेकिन क्या एक औरत खुद औरत होते हुए भी बेटियों से नफरत कर सकती है... विश्वास नहीं होता। बहुत दुख होता है जब हम देखते हैं कि एक औरत खुद अपनी ही बेटियों से सिर्फ इसलिए नफरत करती है क्योंकि वे बेटियां हैं बेटे नहीं। उसे इतना खयाल नहीं रहता कि वह जब पैदा हुई थी तो खुद भी कन्या ही थी अगर उसके मां बाप ने उसे भी मार दिया होता तो ??
आज खबर पढी कि मुजफ्फरनगर में पति के तानों से तंग आकर एक मां ने ही अपनी जुडवा बच्चियों को तालाब के पानी में डुबोकर मार डाला। हाय राम कितनी निर्दयी होगी वो औरत जो अपनी ही संतान की हत्या अपने ही हाथों से कर गई और वो सिर्फ इसलिए कि वे बेटे नहीं बेटियां थीं। अब ऐसी औरतों को हम क्या कहें ? मानसिक रूप से विक्षिप्त भी नहीं कह सकते क्योंकि यह सब कुछ उसने पूरे होशोहवास में किया और करने के बाद दोनों बेटियों के अपहरण की रिपोर्ट भी दर्ज कराई।  बहुत दबाव के बाद उसने कबूल किया कि उसने ही खुद अपने हाथों से दोनों बेटियों को तालाब में डुबोया था । तालाब से शव भी बरामद किए गए।

इन सब तरह की घटनाओं का जिम्मेदार आखिर कौन है। क्या ये हमारे समाज की देन है जिसका एक भाग आज भी इसी गन्दी सोच से ग्रसित है कि बेटियां बोझ हैं। आखिर हम क्यों समाज की ऐसी बुराइयों को आज भी साथ लेकर चल रहे हैं। समाज हमसे है हम समाज से नहीं ।हमें समाज की उन्हीं चीजों को साथ लेकर चलना चाहिए जो मानव और मानवता के हित में हैं । मानवता का अहित करने वाली हर रूढिवादी सोच को दिमाग और समाज से निकाल फेंकने की जरूरत है और ऐसा तब होगा जब  हम शिक्षित लोग अशिक्षित लोगों को ऐसे बुरे काम करने से रोकेंगे। इसलिए अगर कहीं भी आपके आसपास कुछ ऐसा होता है जो हमारे भविष्य को नुकसान पहुंचा सकता है तो उसका खुलकर विरोध करें। आगे आएं और इंसानियत को जिंदा रखें।

क्या न्याय मांगना गुनाह है ?



भारत में महिलाओं की सुरक्षा बस नाम की रह गई है। खासकर यूपी और बिहार जैसे राज्यों में तो महिलाओं के साथ कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। कहेगा भी कौन जब सत्तारूढ़ सरकार के मंत्री विधायक ही बच्चियों की आबरू से खेलने लगें तो कानून भी अपंग हो जाता है। उन्नाव की घटना तो कुछ ऐसा साबित करती नजर आ रही है। रेप पीडिता प्रशासन को आरोपी से खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग करती है , सुरक्षा भी दी जाती है लेकिन इसके बावजूद पीडिता की गाडी का एक्सीडेंट करवा दिया जाता है । सुरक्षा मिलने के बावजूद रेप पीडिता के साथ सुरक्षा कर्मियों का न होना और उस पर फिर बीजेपी नेताओं के अटपटे बयान बहुत कुछ बयान कर जाते हैं। समझदार व्यक्ति तो सारा मामला समझ ही जाता है। 
हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि बेमतलब के मुद्दों पर बढ चढ कर बोलने वाली महिला सांसदों और विधायकों की बोली भी उस वक्त बन्द हो जाती है जब सवाल एक बेबस लाचार बलात्कार पीडिता का उठता है। वो भी तो एक महिला है और एक महिला होकर भी एक महिला का दर्द जो न समझे धिक्कार है ऐसी महिलाओं पर। एक्सीडेंट में रेप पीडिता का पूरा परिवार तहस नहस हो जाता है वो भी सिर्फ इसलिए कि उसने भारत के अन्धी न्याय व्यवस्था से न्याय मांग लिया था। क्या भारत में न्याय मांगना इतना बडा अपराध है  ?  ईश्वर न करे अगर अस्पताल में जिन्दगी और मौत से जूझती पीडिता की मौत हो जाती है तो  न्याय पाकर भी उसकी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी।
ताज्जुब होता है देखकर कि एक तरफ लोग बेटी बचाओ का नारा देकर वोट इकठ्ठा करते हैं और सत्ता में आते ही उन्हीं बेटियों को न्याय प्रदान करने से कतराने लगते हैं। आज अगर उस बच्ची को न्याय न मिला तो ये तय हो जाएगा कि सारे कानून और नियम सिर्फ आम बेबस जनता के लिए हैं, यदि आप बीजेपी के नेता हैं तो कानून आपकी मुठ्ठी में है और न्याय आपकी जेब में ।

सुनों भारत की बेटियों



चुप मत रहना अब मत डरना
बेटी विरोधी समाजों से
टकराना बनकर तुम पत्थर 
झूठे रीति रिवाजों से
नारी हो तुम शान हो जग की
इस दुनिया पर बोझ नहीं
नारी हो तो गर्व करो तुम
मन में कोई अफसोस नहीं
सब कुछ कर सकती हो तुम
मन में अपने बस ठान तो लो
हर एक लक्ष्य तुम भेदोगी
विश्वास धनुष अरे तान तो लो
बनकर बिजली हर इक बाधा
चलो अपने दम पर पार करो
हिमा दास बनकर दुनिया में
भारत माँ की जयकार करो
अपनी किस्मत सुनो हे बेटियों
लिख लो खुद अपने हाथों से
चुप मत रहना अब मत डरना
बेटी विरोधी समाजों से
टकराना बनकर तुम पत्थर
झूठे रीति रिवाजों से।।।।



Photo source: internet

जानकारी जरूरी है

लडकियों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए जिससे वे किसी भी अनचाही दिक्कत से बच सके और शोहदों से खुद सुरक्षित कर सके। धीना पुलिस अधीक्षक चन्दौली द्वारा बताई गई इन बातों पर गौर करें और इन्हें अपनाकर अपनी और अपने परिवार की इज्ज़त को सलामत रखें।
वीडियो देखने के लिए क्लिक करें...

https://youtu.be/bD7Z9I2URy8

मेरी मां



आंखें मूँद के जिस पर है ऐतबार,
वो मेरी माँ है
जिसकी गोद में बडा हुआ हूँ
जिसके सहारे खडा हुआ हूँ
मेरे जीवन का जो है आधार
वो मेरी माँ है

वो दुनिया में गर न होती तो मैं न होता
वो रातों में गर न जगती तो मैं न सोता
मैं उसकी दुनिया हूँ
और मेरा पूरा संसार
वो मेरी माँ है

दिल जिसका सारी दुनिया में सबसे बडा है
खुद भूखी रहकर जिसने मेरा पेट भरा है
रोज करना चाहूँ ईश्वर से
पहले जिसका दीदार 
वो मेरी माँ है

आंखे मूँद के जिस पर है ऐतबार,
 वो मेरी माँ है
जिसकी गोद में बडा हुआ हूँ
जिसके सहारे खडा हुआ हूँ 
मेरे  जीवन का जो है आधार 
वो मेरी माँ है।

होली में औरतों से अश्लीलता न दिखाएं



होली का त्योहार बहुत ही खूबसूरत त्योहार है। यह त्योहार हमारे जीवन में रंगों के महत्व को दर्शाने के साथ साथ  सत्य की असत्य पर विजय की कहानी भी बताता है। होली का त्योहार अगर सादगी से मनाया जाए तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन पिछले कुछ सालों से होली के त्योहार से सादगी गायब सी हो गई है। सादगी की जगह हुडदंगई और अश्लीलता ने लेना शुरू कर दिया है। आज माहौल यह हो गया है कि रंग लगाने के बहाने औरतों और लडकियों से बदतमीजी से पेश आया जाता है। अश्लील हरकतें की जाती हैं , उन्हें ऐसी ऐसी जगह पर छूकर रंग लगाया जाता है जहाँँ छूना एक स्त्री की गरिमा के खिलाफ होता है। ऐसी स्थिति में जब औरतें या लडकियां विरोध करती हैं तो कहा जाता है कि बुरा न मानो होली है। 
अजी होली है तो क्या हुआ मर्यादा की हर सीमा आप पार कर जाओगे। नियम तो यह होना चाहिए कि औरतों और लडकियां आपस में एक दूसरे को रंग लगाएं और मर्द आपस में। यदि रंग लगाना ही है तो सिर्फ चेहरे में लगाया जाए न कि उन्हें अर्धनग्न करके अश्लीलता की जाए। हम नहीं कहते हैं कि हर इंसान इस तरह की हरकतें करता है पर कुछ अराजक लोग हैं जो किसी से बद्तमीजी करने के लिए होली जैसे पवित्र त्योहारों का इन्तजार करते रहते हैं।  इनका मन दूषित होता है ये होली का त्योहार नहीं मनाते बल्कि मौके का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।

ऐसी गन्दी सोच वालों पर नजर रखने की जरूरत है और ऐसा सिर्फ समाज के बुद्धिजीवी लोगों की दखलअंदाजी के बाद ही सम्भव हो सकता है। साथ ही साथ हमारे समाज की औरतोंं और युवतियों को भी इस पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्हें चाहिए कि अगर कोई शराबी , या अन्जान इंसान होली में रंग लगाने के बहाने उनसे अश्लीलता से पेश आता है तो वे उसका खुलकर विरोध करें और उनकी शिकायत करें। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि शराबी पिए हुए, भांग खाए हुए लोगों के साथ होली ही न खेलें। 

ऐ समाज के लोगों अपनी आँखें खोलो

ऐ समाज के लोगों अपनी आँखें खोलो

बहुत रहे चुपचाप अरे अब तो कुछ बोलो

कब तक देखोगे जो अत्याचार हो रहा

मासूम बेटियों की इज्ज़त से जो

खिडवाड हो रहा

आज दरिन्दे किसी से भी नहीं डरते हैं

बेखौफ जो दिल में आया बस 

वही करते हैं

कोई रोक नहीं कोई टोक नहीं है

अब इन पर

ये हर लडकी को सडकों पे सताया करते हैं

बद्सलूकी और दुष्कर्म से जब 

दिल नहीं भरता इनका

तो पेट्रोल छिडककर मासूमों को जलाया करते हैं

सरकार और कानून भरोसे रह जाओगे

तो अपनी बच्चियों को कभी बचा ना पाओगे

अगर बचानी है अपनी इज्ज़त तो जागो

बन सुरक्षा कवच बेटियों के संग हो लो

ऐ समाज के लोगों अपनी आँखें खोलो

बहुत रहे चुपचाप अरे अब तो कुछ बोलो

छात्राओं में शोहदों का बढता खौफ

हम भले ही कहते हैं कि हमारा समाज शिक्षित हो रहा है मगर सच तो यह है कि पिछले कुछ समय में कुछ दबंगों के साथ साथ शिक्षित परिवार के  लडकों की भी मानसिकता बहुत गन्दी हो चुकी है जिसका आलम यह है कि लडकियाँ और महिलाएं अपने आपको और भी ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रही हैं। आम भाषा में जिन्हें हम 'शोहदों' के नाम से जानते हैं जिनका काम सिर्फ लडकियों पर बुरी नजर रखना और उन पर गन्दे गन्दे कमेंट करना होता है, इन लोगों ने इस हद तक लडकियों को परेशान कर रखा है कि इनके डर से वे कालेज तक छोड दे रही हैं। आज अखबार में पढा कि उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में एक छात्रा एक शोहदे से इतनी आजिज आ चुकी है कि उसने कालेज जाना ही छोड दिया।इसके बाद उस शोहदे की हिम्मत तो देखिए वह छात्रा के घर पहुंच गया और उससे छेडखानी की और घर वालों के साथ भी गाली गलौज की।

यह बात सिर्फ प्रतापगढ़ जिले की ही नहीं है बल्कि न जाने कितने जिले कितने कालेजों की लडकियां इन शोहदों की हरकतों से परेशान हैं। कालेज की छुट्टी नहीं होती कि गेट पर शोहदों की लाइन लग जाती है। कुछ लडकियां तो बुरे और गन्दे कमेंट्स सुनने की आदत बना लेती हैं और कुछ डर के मारे कालेज छोडकर घर बैठ जाती हैं।आखिर कब तक चलेगा यह सब ? कब तक हमारी सरकार और कानून सोता रहेगा। आजकल तो आलम यह है कि महिलाओं और लडकियों की सुरक्षा के पुख्ता इन्तजाम की तो बात ही छोडिये अगर कोई लडकी किसी शोहदे के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराना चाहती है तो लिखी नही जाती क्योंकि ये शोहदे भी किसी न किसी बडे घराने या पावरफुल इंसान से सम्बन्धित होते हैं ,यदि किसी दबाव में एफआईआर लिख भी ली गई तो रिश्वतखोरी,सिफारिश और राजनीतिक दबाव की वजह से कोई कार्यवाही नहीं हो पाती है। शायद यही वजह है कि शोहदों की हिम्मत और लडकियों की आफत  दिनों दिन बढती जा रही है।

यदि इसी तरह से माहौल बिगडता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब लडकियां कालेज जाना ही छोड देंगी।हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि लडकियों के साथ हो रही इस तरह की बदतमीजी और  छेडखानी पर रोक लगाए और कालेज की छात्राओं की सुरक्षा के पूरे इन्तजाम करे। साथ ही साथ हम आम नागरिकों से भी अनुरोध करते हैं कि यदि आपके सामने कोई शोहदा किसी लडकी या महिला पर गन्दे कमेंट करता है या कोई बदतमीजी करता है तो खामोश न रहें बल्कि इसका विरोध करें। ये तो कतई न सोचें कि वो पता नहीं किसके घर की लडकी  है हम क्यों विरोध करें।याद रखिए यदि आज किसी जगह किसी दूसरे की बेटी बहन के साथ छेडखानी होते देखते हुए आप चुप रहे तो हो सकता है कि उसी जगह कल आपकी बेटी या बहन होगी तो उसके साथ भी इसी तरह की घटना हो सकती है। इसलिए चुप न रहें बल्कि आवाज उठाएं और अपनी बच्चियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करें।

चलो हम बीते हुए कल से बगावत करते हैं

जख्मों पे अपने मरहम की सजावट करते हैं

चलो हम बीते हुए कल से बगावत करते हैं

तोडकर खामोशियाँ हम अपने लबों की

सच बोलने की आज फिर हिमाकत करते हैं

चलो हम बीते हुए कल से बगावत करते हैं

करके बयां हर दास्तान-ए-जुल्म आइए

अंधे कानून से इंसाफ की चाहत करते हैं

चलो हम बीते हुए कल से बगावत करते हैं

घूंघट उठा के अपना आओ सरे बाजार

बेनकाब कुछ शरीफों की शराफत करते हैं

चलो हम बीते हुए कल से बगावत करते हैं

जख्मों पे अपने मरहम की सजावट करते हैं

चलो हम बीते हुए कल से बगावत करते हैं

नारी भी हो आजाद वो हिन्दुस्तान चाहिए

हमको भी हक चाहिए वो सम्मान चाहिए

नारी भी हो आजाद वो हिन्दुस्तान चाहिए

वो धरती चाहिए जिसपे हम फूलें और फलें

हों सुरक्षित जिसके नीचे वो आसमान चाहिए

ना सुन्दर पति चाहिए ना चाहिए धनवान

जो समझे हमको बस वो इक इंसान चाहिए

सह सहकर जुल्मों सितम बेदर्द दुनिया के

लब सूख चुके हैं इन पर अब मुस्कान चाहिए

गर अग्नि परीक्षा लेना है शौक मर्दों का

तो हमको भी मर्दों का  इम्तिहान चाहिए

कब तक हम जानी जाएंगी मर्दों के नाम से

हमको भी तो अपनी इक पहचान चाहिए

हमको भी हक चाहिए वो सम्मान चाहिए

नारी भी हो आजाद वो हिन्दुस्तान चाहिए

भाजपा सरकार में बढता बलात्कार

उत्तर प्रदेश में बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। एक के बाद एक सामने आती बलात्कार की घटनाएं यह साबित करती हैं कि हमारा प्रदेश महिलाओं के लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है।वह सरकार जो सत्ता में आते ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रयासरत नजर आ रही थी उसी के आदमी बलात्कारी निकल रहे हैं। जब सत्ता पर काबिज लोग ही अपराध करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि प्रदेश के बुरे दिन आ गए हैं। सबसे बडा ताज्जुब तो तब होता है जब सरकार के पदों पर पदासीन लोग सब कुछ जानते हुए भी अपराधी को बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

उत्तर प्रदेश में इस समय भाजपा की सरकार है और भाजपा का ही एमएलए इस समय उन्नाव घटना में मुख्य बलात्कारी है। लगभग सब कुछ खबर होने के बावजूद भी पुलिस और सरकार इस बलात्कारी एमएलए को बचाने की भरपूर कोशिश में लगी हुई थी , कितने शर्म की बात है। सरकार ऐसा सिर्फ इसलिए कर रही है ताकि उसकी पार्टी की छवि न खराब हो और वोट बैंक सलामत रहे लेकिन सिर्फ कुछ वोटों के लिए किसी बलात्कारी को पनाह देना या जनता के साथ विश्वासघात करना किसी तरह से उचित नहीं है।

अगर बलात्कारी सिर्फ इसलिए बच जाता है कि वह एक भाजपा का विधायक है या उसे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का समर्थन हासिल है तो यह हमारी न्यायपालिका पर सवाल खडा कर सकता है। बलात्कारी सिर्फ एक अपराधी होता है चाहे वह कोई भी हो । जब एक खास इंसान कोई घिनौना काम कर देता है तो उसकी खासियत वहीं पर खत्म हो जानी चाहिए और उसके साथ सिर्फ उसी तरह का सुलूक किया जाना चाहिए जैसा कि एक आम अपराधी के साथ होता है।

पापा ! बेटी हूँ इसलिए मार न देना

दकियानूसी खयालात में

आकर दुनिया की बात में

कोख में ही खंजर तुम उतार ना देना

पापा बेटी हूँ मैं इसलिए मुझे मार ना देना

आने दो बस दुनिया में पापा बोझ न बनूंगी मैं

रूखा सूखा जो भी दोगे खुशी से खा लूंगी मैं

सोचकर मेरे बारे में कुछ टेंशन मत लेना तुम

एक ही खिलौना हो तो भैया को दे देना तुम

मुझको कुछ देना ना देना तुमको सब आजादी है

प्यार से बेटी कहना मेरे लिए इतना ही काफी है

मैं नहीं कहती कि मुझको बेटे जैसा प्यार करो

मुझको जिन्दा रहने दो इतना ही उपकार करो

जनम दिया है बेटी को ये सोच के देखो हे पापा

मम्मी को अपनी नजरों से उतार ना देना

पापा बेटी हूँ मैं इसलिए मुझे मार ना देना


दकियानूसी खयालात में

आकर दुनिया की बात में

कोख में ही खंजर तुम उतार ना देना


पापा बेटी हूँ मैं इसलिए मुझे मार ना देना

भ्रूणहत्या किस श्रेणी की कायरता है

तरह तरह के कायर देखे

पूछने का अब दिल करता है

गर्भ में इक बेटी को मारना

किस श्रेणी की कायरता है

ऐ समाज मुझको तू आज

इक बात जरा खुल के समझा

तेरा ये इंसाँ मार के बेटी

बेटों पर ही क्यों मरता है

या मेरे रब तू जाने सब

फिर क्यों जुल्म ये होता है

क्या तेरा इंसान आजकल

तुझसे भी नहीं डरता है

इस धरती पर सर्वश्रेष्ठ

हम खुद को मानव कहते हैं

अपनी बच्ची की ही हत्या

अरे यह कैसी मानवता है

कूडेदान में देखता हूँ जब

नवजात बच्चियों की लाशें

आग लगा दूँ दुनिया भर को

कुछ ऐसा मन करता है


तरह तरह के कायर देखे

पूछने का अब दिल करता है

गर्भ में इक बेटी को मारना


किस श्रेणी की कायरता है

कब तक बेटियां त्याग करेंगी ?

एक बेटी जब से जन्म लेती है तभी से उसका त्याग शुरू हो जाता है। यह हमारी पुरानी सोच का असर है कि अक्सर माँ बाप बेटियों को उतनी तवज्जो नहीं देते हैं जितना कि बेटों को, लेकिन त्याग की मूर्तियां ये बेटियां कभी अपने परिवार से या माँ बाप से इस बात की शिकायत नहीं करती हैं। बात चाहे शिक्षा की हो , आजादी की हो या अन्य सुख सुविधाओं की हो बेटों की तुलना में हमेशा बेटियों को ही समझौता करना पडता है। यहां तक कि यह भी सच है कि माँ बाप के द्वारा कमाई गई सम्पत्ति में बेटियों का भी उतना ही हक होता है जितना कि बेटों का, लेकिन बेटियां कभी भी इन सम्पत्तियों पर अपना हक नहीं जताती हैं। एक तरफ जहाँ दो भाई छोटी सी सम्पत्ति के लिए भी एक दूसरे की जान के दुश्मन बन जाते हैं वहीं बहनें अपना हिस्सा भी भाइयों को सौंपकर ससुराल चली जाती हैं।

हमारी बेटियों के इतना त्याग करने के बाद भी हमारा समाज बेटियों से नफरत करता है, बेटियों को बोझ समझता है, उन्हें पैदा होने से पहले ही मार देता है यह बडे ही दुख और शर्म की बात है। आखिर क्यों हमारा समाज ऐसा है ? इस सवाल का जवाब हमें वहीं ले जाता है जहां से समाज का पहली बार निर्माण शुरू हुआ था। शायद अकेले रहने वाले इंसानों ने जब समाज बनाया तभी उसने बेटियों के हक और अधिकार सीमित कर दिए थे। चूंकि यह समाज के निर्माण के शुरुआती दिनों में हुआ था तो समय बीतने के साथ साथ इसे समाज का एक मूलभूत नियम समझा जाने लगा। इसके बाद आने वाली पीढियों ने बेटियों से आजादी छीनकर और उन्हें शिक्षा से वंचित रखकर इस नियम को इतना मजबूत बना दिया कि आज तक हमें इस पक्षपातपूर्ण नियम को बदलने के लिए जद्दोजहद करनी पड रही है।

हालांकि "शिक्षा " ने समाज के इस बडे पेड की बहुत सी शाखाओं को इस नियम से आजाद कर दिया है लेकिन कुछ शाखाएं ऐसी भी हैं जहाँ पर शिक्षा अभी तक पहुंच ही नहीं पाई है और उन शाखाओं में अब भी बेटियों के बिपक्ष में बनाया गया यह नियम ही लागू है।

बेटियों ने हमेशा पुराने समाज के नियमों के चलते अपने सपनों का बलिदान दिया है लेकिन ये समाज आखिर कब तक बेटियों से ही त्याग करवाता रहेगा । क्या बेटियों के लिए समाज अपने कुछ पुराने दकियानूसी नियमों को त्याग नहीं सकता ? बेटियों ने काफी हद तक अपने आपको सम्भालने का प्रयास किया है और जागरूक हुई हैं, शिक्षित हुईं हैं लेकिन फिर भी उन्हें हम मर्दों और समाज के सपोर्ट की जरुरत है इसलिए हमें चाहिए कि हम उनको , उनके सपनों का वो आसमान मुहैया कराएं जिसमें वो आजाद होकर उडान भर सकें और लोगों की यह सोच बदल सकें कि बेटियां बोझ नहीं होती बल्कि बेटी ईश्वर का दिया हुआ वह जरूरी और कीमती तोहफा है जिनके न होने पर इस समाज, इस मानव जाति और इस दुनिया की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।


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