भारत में महिलाओं की सुरक्षा बस नाम की रह गई है। खासकर यूपी और बिहार जैसे राज्यों में तो महिलाओं के साथ कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। कहेगा भी कौन जब सत्तारूढ़ सरकार के मंत्री विधायक ही बच्चियों की आबरू से खेलने लगें तो कानून भी अपंग हो जाता है। उन्नाव की घटना तो कुछ ऐसा साबित करती नजर आ रही है। रेप पीडिता प्रशासन को आरोपी से खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग करती है , सुरक्षा भी दी जाती है लेकिन इसके बावजूद पीडिता की गाडी का एक्सीडेंट करवा दिया जाता है । सुरक्षा मिलने के बावजूद रेप पीडिता के साथ सुरक्षा कर्मियों का न होना और उस पर फिर बीजेपी नेताओं के अटपटे बयान बहुत कुछ बयान कर जाते हैं। समझदार व्यक्ति तो सारा मामला समझ ही जाता है।
हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि बेमतलब के मुद्दों पर बढ चढ कर बोलने वाली महिला सांसदों और विधायकों की बोली भी उस वक्त बन्द हो जाती है जब सवाल एक बेबस लाचार बलात्कार पीडिता का उठता है। वो भी तो एक महिला है और एक महिला होकर भी एक महिला का दर्द जो न समझे धिक्कार है ऐसी महिलाओं पर। एक्सीडेंट में रेप पीडिता का पूरा परिवार तहस नहस हो जाता है वो भी सिर्फ इसलिए कि उसने भारत के अन्धी न्याय व्यवस्था से न्याय मांग लिया था। क्या भारत में न्याय मांगना इतना बडा अपराध है ? ईश्वर न करे अगर अस्पताल में जिन्दगी और मौत से जूझती पीडिता की मौत हो जाती है तो न्याय पाकर भी उसकी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी।
ताज्जुब होता है देखकर कि एक तरफ लोग बेटी बचाओ का नारा देकर वोट इकठ्ठा करते हैं और सत्ता में आते ही उन्हीं बेटियों को न्याय प्रदान करने से कतराने लगते हैं। आज अगर उस बच्ची को न्याय न मिला तो ये तय हो जाएगा कि सारे कानून और नियम सिर्फ आम बेबस जनता के लिए हैं, यदि आप बीजेपी के नेता हैं तो कानून आपकी मुठ्ठी में है और न्याय आपकी जेब में ।

