महिला सुरक्षा

हर एक महिला की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए
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कब तक बेटियां त्याग करेंगी ?

एक बेटी जब से जन्म लेती है तभी से उसका त्याग शुरू हो जाता है। यह हमारी पुरानी सोच का असर है कि अक्सर माँ बाप बेटियों को उतनी तवज्जो नहीं देते हैं जितना कि बेटों को, लेकिन त्याग की मूर्तियां ये बेटियां कभी अपने परिवार से या माँ बाप से इस बात की शिकायत नहीं करती हैं। बात चाहे शिक्षा की हो , आजादी की हो या अन्य सुख सुविधाओं की हो बेटों की तुलना में हमेशा बेटियों को ही समझौता करना पडता है। यहां तक कि यह भी सच है कि माँ बाप के द्वारा कमाई गई सम्पत्ति में बेटियों का भी उतना ही हक होता है जितना कि बेटों का, लेकिन बेटियां कभी भी इन सम्पत्तियों पर अपना हक नहीं जताती हैं। एक तरफ जहाँ दो भाई छोटी सी सम्पत्ति के लिए भी एक दूसरे की जान के दुश्मन बन जाते हैं वहीं बहनें अपना हिस्सा भी भाइयों को सौंपकर ससुराल चली जाती हैं।

हमारी बेटियों के इतना त्याग करने के बाद भी हमारा समाज बेटियों से नफरत करता है, बेटियों को बोझ समझता है, उन्हें पैदा होने से पहले ही मार देता है यह बडे ही दुख और शर्म की बात है। आखिर क्यों हमारा समाज ऐसा है ? इस सवाल का जवाब हमें वहीं ले जाता है जहां से समाज का पहली बार निर्माण शुरू हुआ था। शायद अकेले रहने वाले इंसानों ने जब समाज बनाया तभी उसने बेटियों के हक और अधिकार सीमित कर दिए थे। चूंकि यह समाज के निर्माण के शुरुआती दिनों में हुआ था तो समय बीतने के साथ साथ इसे समाज का एक मूलभूत नियम समझा जाने लगा। इसके बाद आने वाली पीढियों ने बेटियों से आजादी छीनकर और उन्हें शिक्षा से वंचित रखकर इस नियम को इतना मजबूत बना दिया कि आज तक हमें इस पक्षपातपूर्ण नियम को बदलने के लिए जद्दोजहद करनी पड रही है।

हालांकि "शिक्षा " ने समाज के इस बडे पेड की बहुत सी शाखाओं को इस नियम से आजाद कर दिया है लेकिन कुछ शाखाएं ऐसी भी हैं जहाँ पर शिक्षा अभी तक पहुंच ही नहीं पाई है और उन शाखाओं में अब भी बेटियों के बिपक्ष में बनाया गया यह नियम ही लागू है।

बेटियों ने हमेशा पुराने समाज के नियमों के चलते अपने सपनों का बलिदान दिया है लेकिन ये समाज आखिर कब तक बेटियों से ही त्याग करवाता रहेगा । क्या बेटियों के लिए समाज अपने कुछ पुराने दकियानूसी नियमों को त्याग नहीं सकता ? बेटियों ने काफी हद तक अपने आपको सम्भालने का प्रयास किया है और जागरूक हुई हैं, शिक्षित हुईं हैं लेकिन फिर भी उन्हें हम मर्दों और समाज के सपोर्ट की जरुरत है इसलिए हमें चाहिए कि हम उनको , उनके सपनों का वो आसमान मुहैया कराएं जिसमें वो आजाद होकर उडान भर सकें और लोगों की यह सोच बदल सकें कि बेटियां बोझ नहीं होती बल्कि बेटी ईश्वर का दिया हुआ वह जरूरी और कीमती तोहफा है जिनके न होने पर इस समाज, इस मानव जाति और इस दुनिया की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।


सुरक्षित महिला सुरक्षित समाज

देश कोई भी हो सुरक्षित तभी समझा जाएगा जब वहां के बच्चे और औरतें सुरक्षित हों। कोई देश कितनी भी तरक्की क्यों न कर ले कितनी भी योजनाएं क्यों न चला ले लेकिन यदि सडकों पर चलने वाली महिला के मन में डर बना हुआ है कि कोई उसके गहने न छीन ले या गलत कमेंन्ट्स न कर दे या अगवा करके बलात्कार न कर दे तो वह देश या प्रदेश असुरक्षित ही कहा जाएगा।
जो सरकार महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सजग नहीं है वह ज्यादा दिन तक शासन नहीं कर सकती। एक सरकार के समर्थक से मेरी बात हुई तो उन्होंने मुझसे कहा कि आपको विकास दिखाई क्यों नहीं देता है सडकों का निर्माण हो रहा है , बिजली व्यवस्था भी पटरी पर लौट रही है और बेरोजगारी को भी दूर करने का प्रयास किया जा रहा है फिर आप कैसे कह रहे हैं कि प्रदेश या देश में महिलाएं सुरक्षित नहीं है। मैं खामोश रहा कुछ नहीं बोला।
अगले ही दिन उनकी 20 साल की बेटी शहर किसी काम से जा रही थी तो साथ में वो भी थे। मैने पूछा अरे सर कहाँ की तैयारी है? वो बोले बस बेटी को शहर हास्टल तक पहुँचाने जा रहे हैं।
मैनें कहा तो उनको बस में बैठा दीजिये वो चली जाएंगी आप क्यों परेशान हो रहे हैं? वो बोले अरे नहीं लडकी है अकेले जाना ठीक नहीं है रास्ता भी लम्बा है , माहौल ठीक नहीं है आजकल, इसलिए छोड कर आना ही ठीक होगा।
दरअसल, ये वही महानुभाव हैं जो कल सरकार की बडी बडी तारीफ कर रहे थे और कह रहे थे कि प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा के व्यापक इन्तजाम है लेकिन जब अपनी बेटी की सुरक्षा की बात आई तो खुद उन्होंने कबूल कर लिया कि प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा में अभी बहुत सारी कमियाँ हैं।
सिर्फ़ योजनाओं का निर्माण कर देना ही सरकार का फर्ज नहीं है बल्कि उस योजना पर सरकार की तब तक जिम्मेदारी होनी चाहिए जब तक कि उसका क्रियान्वयन न हो जाए और वह योजना सफल न हो जाए। असफल योजनाओं की समीक्षा करके पुनः नई तैयारी के साथ नई योजना लानी चाहिए और लागू करना चाहिए। ऐसा तब तक होते रहना चाहिए जब तक कि योजना सफल न हो जाए।

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