होली का त्योहार बहुत ही खूबसूरत त्योहार है। यह त्योहार हमारे जीवन में रंगों के महत्व को दर्शाने के साथ साथ सत्य की असत्य पर विजय की कहानी भी बताता है। होली का त्योहार अगर सादगी से मनाया जाए तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन पिछले कुछ सालों से होली के त्योहार से सादगी गायब सी हो गई है। सादगी की जगह हुडदंगई और अश्लीलता ने लेना शुरू कर दिया है। आज माहौल यह हो गया है कि रंग लगाने के बहाने औरतों और लडकियों से बदतमीजी से पेश आया जाता है। अश्लील हरकतें की जाती हैं , उन्हें ऐसी ऐसी जगह पर छूकर रंग लगाया जाता है जहाँँ छूना एक स्त्री की गरिमा के खिलाफ होता है। ऐसी स्थिति में जब औरतें या लडकियां विरोध करती हैं तो कहा जाता है कि बुरा न मानो होली है।
अजी होली है तो क्या हुआ मर्यादा की हर सीमा आप पार कर जाओगे। नियम तो यह होना चाहिए कि औरतों और लडकियां आपस में एक दूसरे को रंग लगाएं और मर्द आपस में। यदि रंग लगाना ही है तो सिर्फ चेहरे में लगाया जाए न कि उन्हें अर्धनग्न करके अश्लीलता की जाए। हम नहीं कहते हैं कि हर इंसान इस तरह की हरकतें करता है पर कुछ अराजक लोग हैं जो किसी से बद्तमीजी करने के लिए होली जैसे पवित्र त्योहारों का इन्तजार करते रहते हैं। इनका मन दूषित होता है ये होली का त्योहार नहीं मनाते बल्कि मौके का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।
ऐसी गन्दी सोच वालों पर नजर रखने की जरूरत है और ऐसा सिर्फ समाज के बुद्धिजीवी लोगों की दखलअंदाजी के बाद ही सम्भव हो सकता है। साथ ही साथ हमारे समाज की औरतोंं और युवतियों को भी इस पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्हें चाहिए कि अगर कोई शराबी , या अन्जान इंसान होली में रंग लगाने के बहाने उनसे अश्लीलता से पेश आता है तो वे उसका खुलकर विरोध करें और उनकी शिकायत करें। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि शराबी पिए हुए, भांग खाए हुए लोगों के साथ होली ही न खेलें।
