महिला सुरक्षा

हर एक महिला की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए

लडकियों को भी मौके मिलने चाहिए

दुनिया दिनों दिन आगे बढती जा रही है लेकिन हमारे देश में लोग आज भी पुरानी रूढिवादी सोच से जकडे हुए हैं। जहाँ एक तरफ विकसित देशों की महिलाएं पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ रही हैं और अपने परिवार के साथ साथ देश का नाम भी रोशन कर रही हैं वहीं भारत में आज भी बेटों की चाहत में बेटियों की बलि दी जाती है। यहां पर यदि कोई लडकी पढना लिखना चाहती है, अपने सपने पूरे करना चाहती है तो परिवार के लोग ही साथ नहीं देते।समाज के लोग लडकियों का हौसला बढाने की जगह उनकी हिम्मत तोडने का काम कर रहे हैं।

काबिलियत होने के बावजूद भी देश की बेटियों को न जाने कितनी समस्याओं का सामना करना पडता है। लडकियां एक हद तक परम्परागत समाज से लड भी लेती हैं लेकिन जब उनके परिवार के लोग ही साथ छोड देते हैं तो उनकी हिम्मत टूटने लगती है। वैसे भी एक लडकी के लिए अपने सपने पूरे करने के लिए पुराने विचारों वाले अपने ही परिवार से लडना आसान नहीं होता।

पेशेवर रेसलर "कविता दलाल" का कहना है ," समाज की रूढिवादी सोच से लडना आसान नहीं होता।लडकियों के मामले में तो यह और भी मुश्किल है लेकिन एक शुरुआत करनी होती है जो मैनें और मेरे परिवार ने की।मेरी सफलता को आज सम्मान मिल रहा है जिससे यह साबित होता है कि अच्छी शुरुआत अच्छा परिणाम जरूर देती है।"

कविता भी उन लडकियों में से एक हैं जिन्हें समाज की बुरी बातों और तानों का सामना करना पडा । उन्हें भी कहा गया कि रेसलिंग उनके वश की बात नहीं है क्योंकि वो एक लडकी हैं लेकिन कविता ने हार नहीं मानी ,उन्हें परिवार का सपोर्ट मिला और उन्होंने सलवार कमीज में ही रेसलिंग करने का फैसला किया। समाज की बाधाओं को अपनी हिम्मत और हौसले से पार करते हुए कविता आज एक सफल रेसलर हैं।

भारत की हर बेटी में वो जुनून है ,वो आग है कि वो सानिया मिर्ज़ा, कविता दलाल, पी.वी.सिन्धू, दीपिका कुमारी, मिताली राज,साइना नेहवाल, अश्विनी पोनप्पा आदि लडकियों की तरह सफलता की नई इबारत लिख सकती हैं और अपने साथ अपने देश का नाम भी रोशन कर सकती हैं। बस जरूरत है तो उन पर विश्वास करने की और उन्हें पर्याप्त मौके देने की। एक बेटी में भी उतनी ही क्षमता होती है जितनी कि एक बेटे में। इसलिए हर शिक्षित इंसान का फर्ज है कि उन्हें जब भी मौका मिले वो अशिक्षित,नादान और पुरानी सोच वाले ग्रामीण इंसान को समझाने का प्रयास करें कि बेटियाँ बेटों से कम नहीं होती ताकि वो लडकी और लडके मे भेद न करें तथा लडकियों को भी लडकों की तरह पढने लिखने का मौका मिले।

घरेलू हिंसा को पहचानिए


महिला संरक्षण अधिनियम, 2005

महिला संरक्षण अधिनियम, 2005

एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा का शिकार से को बचाना है। यह अधिनियम भारतीय संसद के द्वारा २६ अक्टूबर २००६ को लागू हुआ।




क्या आप जानते हैं कि घरेलू हिंसा आखिर है क्या ?

हम बताते हैं आपको।

किसी भी तरह का शारीरिक कष्ट जैसे मारना, पीटना या ऐसा कोई कृत्य जिससे स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या होने का डर हो, किसी महिला से यौन दुर्व्यवहार करना अर्थात उसकी गरिमा का उल्लंघन करना, अपमानित करना , तिरस्कार, गाली देना, बुरी भाषा द्वारा सम्बोधित करना, आर्थिक रूप से शोषण करना और मानसिक रूप से परेशान करना इत्यादि घरेलू हिंसा के अन्तर्गत आता है।


इसके अलावा किसी भी प्रकार का

  • शारीरिक कष्ट (जैसे मार-पीट करना, थप्पड़ मारना, दाँत काटना, ठोकर मारना, लात मारना इत्यादि),

  • यौन शोषण (जैसे बलात्कार अथवा जबरदस्ती बनाए गए शारीरिक सम्बंध, अश्लील साहित्य या सामग्री देखने के लिए मजबूर करना, अपमानित करने के दृष्टिकोण से किया गया लैंगिक व्यवहार, और बालकों के साथ लैंगिक दुर्व्यवहार),

  • मौखिक और भावनात्मक हिंसा ( जैसे अपमानित करना, गालियाँ देना, चरित्र और आचरण पर आरोप लगाना, लड़का न होने पर प्रताड़ित करना, दहेज के नाम पर प्रताड़ित करना, नौकरी न करने या छोड़ने के लिए मजबूर करना, आपको अपने मन से विवाह न करने देना या किसी व्यक्ति विशेष से विवाह के लिए मजबूर करना, आत्महत्या की धमकी देना इत्यादि),

  • किसी महिला को उसके और उसके बच्चे को अपनी देखभाल के लिए धन और संसाधन न देना, आपको अपना रोज़गार न करने देना, या उसमें रुकावट डालना, आपकी आय, वेतन इत्यादि आपसे ले लेना, घर से बाहर निकाल देना इत्यादि), भी घरेलू हिंसा है।


नए साल में

कुछ समय बाद हम सब एक नये वर्ष में प्रवेश कर जाएंगे। हर साल जब हम किसी नये साल में प्रवेश करते हैं तो उम्मीद करते हैं कि आने वाला साल पिछले साल की तुलना में सुखदायक होगा और आगे बढने के कुछ नये अवसर भी विकसित होंगे। पुराना साल जब बीतने वाला होता है तो हम अपने आप से वादा करते हैं कि आगे के वर्ष में हम पहले से ज्यादा मेहनत करेंगे , प्रेम से रहेंगे और दोस्तों तथा परिवार के सदस्यों के मन में जो भी मनमुटाव होगा उसे दूर करेंगे, नौकरी में सफलता हासिल करेंगे , औरतों का सम्मान करेंगे वगैरह वगैरह।

इन सबमें जो सबसे बडा मुद्दा है वह है औरतों का सम्मान। इंसान कितना भी विकास के पथ पर आगे बढ रहा है लेकिन कहीं न कहीं औरतों के सम्बन्ध में जो पुरानी दकियानूसी सोच है वह मर्दों में पीढी दर पीढी स्थानांतरित हो रही है। अब देख लीजिए नये साल के सेलिब्रेशन पर खुशी का इजहार करने के लिए लडकियों से छेडखानी की जाती है। कुछ लोगों ने सोच रखा होता है कि फला लडकी को नये साल पर प्रपोज करेंगे अगर हाँ करेगी तो ठीक वरना किसी न किसी तरह से उसको हासिल करना है। यह सोच है आजकल के नौजवानों की जो प्यार के नाम पर लडकियों को गलत तरीकों से हासिल करना चाहते हैं। जब कोई लडकी किसी का प्रेम अस्वीकार करती है तो वह उस प्रेमी की नजर में नफरत की पात्र बन जाती है और उसे नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया जाता है। कभी कोई उन पर एसिड फेंकता है तो कोई बलात्कार करता है। आज भी मर्द औरतों को अपने बराबर का दर्जा नहीं देना चाहते बल्कि वे औरतों को एक इंटरटेनमेंट की ही चीज समझते हैं । हमें मर्दों की यही सोच बदलनी है।

हमें यह समझना होगा कि औरतों को भी अपनी इच्छा रखने का हक है , उन्हें भी इनकार करने का अधिकार है। औरतों के मन को समझने की जरुरत है।

नये साल में हम बस इतनी उम्मीद करते हैं लोग औरतों को इंसान समझें और उन्हें वह इज्ज़त दें जिनकी वे हकदार हैं।

हैप्पी न्यू ईयर।

औरत से घर बनता है

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते , रमन्ते तत्र देवता: ।"

उपर्युक्त श्लोक की लाइन का अर्थ है कि जिस स्थान पर स्त्रियों की पूजा होती है अर्थात सम्मान होता है उस स्थान पर स्वयं देवताओं का निवास होता है।

यह कलयुग है इसलिए शायद देवता किसी स्थान पर प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखे जाते लेकिन इतना जरूर अन्दाजा लगाया जा सकता है कि जिस स्थान पर सुख मिले, शान्ति मिले और खुशी तथा प्रेम का वातावरण हो वहां पर अवश्य ही देवता निवास करते होंगे। इस प्रकार से कलयुग में भी उपर्युक्त श्लोक की लाइन बहुत ही सटीक बैठती है। आपने देखा होगा कि जिस घर में औरतें खुश नहीं रहतीं है या जिस घर में औरतों को गालियां दी जाती हैं या भेदभाव किया जाता है उस घर के लोग शान्ति महसूस नहीं कर पाते, सुख की रोटियां नहीं खा पाते। कुल मिलाकर पूरे घर में कलह और द्वेष ही फैला होता है। परिवार का हर सदस्य अपने बारे में ही सोचते है हमेशा एक दूसरे को नीचा दिखाने और बुराई करने में ही लगे होते हैं।

वहीं दूसरी तरफ यदि किसी घर में महिलाओं का सम्मान होता है , हर मसले में उनकी राय ली जाती है और वे खुश रहती हैं तो उस घर में खुशियाँ ही निवास करती हैं। परिवार का हर सदस्य एक दूसरे के बारे में अच्छी और सकारात्मक सोच रखता है।इससे घर में एकता बनी रहती है ।यदि परिवार का एक सदस्य नाराज है तो हर सदस्य उस एक को मनाने में लग जाता है। यही असली खुशी होती है।

याद रखिए, मर्दों से कभी घर नहीं बनता ।घर को सिर्फ औरतें ही घर बनाती हैं। वो जितनी खुश रहेंगी घर भी उतना ही खूबसूरत होगा और यदि घर खूबसूरत होगा तो अवश्य ही देवता उसमें निवास करना चाहेंगे।

इसलिए औरतों का सम्मान कीजिए, उन्हें गालियां मत दीजिए ,गन्दी भाषा का प्रयोग मत कीजिए। औरत को सम्मान के गहनों से सजाइये

और अपने घर को वास्तव में घर बनाइए।

महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं

  गलत नियत वालों को मौका और नहीं अब और नहीं महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं अब और नहीं जागो हे भारत की बेटियों अब तो नींद से जागो तुम अपनी स...

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