कभी कभी हम देखते हैं कि पति पत्नी में सिर्फ खुद के वजूद या एहमियत को लेकर अनबन हो जाती है । पति समझता है कि घर का मालिक वही है हमेशा उसी की मर्जी चलनी चाहिए या पत्नी समझती है सारा घर वही सम्भालती है इसलिए हर फैसला उसकी रजामंदी से ही होना चाहिए। जिस घर में पति और पत्नी दोनों नहीं झुकना चाहते उस घर में पति पत्नी का रिश्ता कमजोर होने लगता है, कभी कभी तो टूट भी जाता है।
ऐसे में पति और पत्नी दोनों को यह समझना होगा कि वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, एक ही साईकिल के दो पहिए ह़ै, दोनों में से यदि एक भी किसी फैसले के खिलाफ है तो वह फैसला सुकून नही दे सकता बल्कि समस्या ही खडी करेगा। इसमें कोई शक नहीं कि मर्द थोडे कठोर होते हैं और औरतें कोमल , इसीलिए ज्यादातर नियम मर्दों के बनाए हुए हैं और उन्हीं के पक्ष में हैं लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है औरतों की कोई एहमियत नहीं है। यदि पत्नी अपने पति के फैसलों में उसका साथ दे रही है तो पति को भी चाहिए कि वह अपने फैसलों में पत्नी की रजामंदी शामिल करे।
पति वह नहीं है जो बल का प्रयोग करके पत्नी का प्रेम हासिल करता है। यूँ तो भारतीय पत्नियों की विशेषता है कि वे अपने पति से प्रेम ही करती हैं चाहे पति अच्छा हो या उन्हें मारता पीटता हो लेकिन लायक पति कहलाने का हकदार तो सिर्फ वही है जो प्रेम से अपनी पत्नी का प्रेम हासिल करता है। सच्चे पति पत्नी के रिश्ते में कोई छोटा या बडा नहीं होता है बल्कि दोनों बराबर होते हैं।
औरतें सम्मान की हकदार हैं और लायक भी , शायद इसीलिए भगवान के नाम से पहले उनकी पत्नियों/प्रेमिका का नाम लिया जाता है जैसे , गौरीशंकर, सीताराम या राधेकृष्ण। इन नामों को देखकर यह मत सोचिए कि गौरी, सीता और राधा क्रमशः शंकर, राम और कृष्ण से श्रेष्ठ हैं इसलिए इनका नाम पहले आता है , बल्कि इसलिए पहले आता है क्योंकि भगवान भी औरतों का सम्मान करते हैं। अपने बारे में सोचने से पहले पत्नी के बारे मे सोचना, अपना हक जताने से पहले उनके हक के बारे में सोचना ही उनका सम्मान करना है।
महिला सुरक्षा
हर एक महिला की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए
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