महिला सुरक्षा

हर एक महिला की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए

देर सही पर इंसाफ हुआ


निर्भया कांड मामले में देर से ही सही लेकिन इंसाफ मिल चुका है। दिल्ली की अदालत ने चारों आरोपियों को 22 जनवरी 2020 को सुबह सात बजे फाँसी पर लटकाने का आदेश जारी किया है। अदालत के इस फैसले से लोगों का अदालत और कानून पर थोडा विश्वास मजबूत होगा और उन मानसिक विकृति के लोगों में थोडा सा खौफ भी पैदा होगा जो लडकियों और छोटी बच्चियों पर हवस भरी गन्दी निगाह रखते हैं। 
आपको बता दें कि दिसंबर 2012 में एक 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा से 6 लोगों ने हैवानियत की हदें पार करते हुए सामूहिक दुष्कर्म करके उसे बुरी तरह घायल करके मरणासन्न अवस्था में सडक के किनारे फेंक दिया था। सभी आरोपियों में से एक आरोपी राम सिंह जेल में ही आत्महत्या कर चुका है जबकि एक आरोपी नाबालिग था जिसे तीन साल की सजा सुनाई गई थी जिसकी सजा पूरी हो चुकी है और उसे दिसंबर 2015  में रिहा भी किया जा चुका है। अब बाकी बचे चारों आरोपियों का भी डेथ वारंट जारी कर दिया गया है। हालांकि अपराधियों के पास अभी भी उपचारात्मक याचिका दायर करने का विकल्प  खुला हुआ है।
देश भर में लगातार बढ रही दुष्कर्म की घटनाओं को देखते हुए इन चारों आरोपियों की फाँसी एक सबक साबित हो सकती है। आरोपियों को पता चलना चाहिए कि औरतों और मासूम बच्चियों पर अब किसी भी तरह का अत्याचार बर्दाश्त नहीं हो सकेगा और हर आरोपी चाहे वह बडे रसूख वाला हो या कम, उसे कडी से कडी सजा मिलेगी। हम निर्भया को तो वापस नहीं ला सकते पर इस  फाँसी से पीडिता के परिवार और देश की जनता को थोड़ी सी शान्ति और राहत जरूर महसूस होगी। 
हम देश की हर महिला और बच्ची के लिए सुरक्षित माहौल की कामना करते हैं।

Photo source:Dainik jagran

बलात्कार: अब तो हद हो चुकी


भारत में बेटियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अब मन में सवाल गहरे हो रहे हैं। बलात्कारियों का हौसला इस कदर बढ चुका है कि वो अपराध करने से बाज नहीं आ रहे हैं। पहले दुष्कर्म करने के बाद पीडिता को जिन्दा छोड देते थे इसलिए कम से कम वो इंसाफ के लिए कानून का दरवाजा तो खटखटा सकती थी लेकिन अब तो हैवानियत इतनी बढ चुकी है कि बलात्कार तो करते ही हैं पीडिता को जला कर मार दे रहे हैं ताकि कोई सबूत न बचे। यह अपराध अब हत्या के अपराध से भी ज्यादा जघन्य और हैवानियत भरा हो चुका है। ये राक्षसी प्रवृत्ति के लोग आखिर कहां से आ गए हैं जो बेटियों को अपनी हवस का शिकार बना कर उनकी जिन्दगी छीन रहे हैं। 
सबसे बडी तकलीफ तब होती है जब पीडिता के पक्ष को कानून सुनना ही नहीं चाहता है। हर बार लगभग ऐसा ही होता है कि कोई बाप या भाई किसी लडकी के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज कराने जाता है तो पुलिस आनाकानी करती है और तरह तरह के तर्क देती है कि वह किसी के साथ भाग गई होगी .. आ जाएगी वगैरह वगैरह। अबे तेरे पास कोई मदद के लिए गया है तो उसकी मदद कर , रिपोर्ट दर्ज कर और तुरंत कार्यवाही कर , हो सकता किसी मासूम की जिन्दगी बच जाए। पुलिस की कामचोरी और घूसखोरी किसी से छुपी नहीं है। कई मामलों में तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि पीडिता के पहुँचने से पहले अपराधी ही थाने पहुँचकर नोटों के बण्डल पकडा देता है तो पुलिस अपने आप अंधी और बहरी हो जाती है न उसे कुछ सुनाई देता है न कुछ दिखाई देता है। 

हम सरकार से यही गुजारिश करना चाहते हैं कि पुलिस को यह आदेश हो कि लडकियों व औरतों के मामले में मामला  किसी भी क्षेत्र का हो और कैसा भी हो तुरंत एफआईआर दर्ज हो और त्वरित कार्यवाही शुरू हो। जैसा कि हैदराबाद वाले केस में हुआ कि पुलिस ने रिपोर्ट इसलिए दर्ज नहीं की क्योंकि मामला उनके क्षेत्र में नहीं आता है। अब यह बहानेबाजी बन्द होनी चाहिए और व्यवस्था ऐसी हो कि औरतों और बच्चियों के सम्बंध में जो भी नजदीकी पुलिस चौकी या थाना हो वहां पर बिना किसी सवाल के रिपोर्ट दर्ज हो और तुरंत एक्शन लिया जाए। पुलिस की थोडी सी सतर्कता किसी मासूम की जिन्दगी बचा सकती है।

नारी नारी को कब समझेगी



हम हमेशा नारी को सम्मान दिलाने की बात करते हैं  और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए प्रयासरत रहते हैं । आखिर लोग बेटियों से इतनी नफरत क्यों करते हैं समझ में नहीं आता। चलिए मान लिया कि पुरुषों को बेटों की चाहत होती है जिसकी वजह से वे औरतों पर भ्रूणहत्या के लिए दबाव बनाते हैं लेकिन क्या एक औरत खुद औरत होते हुए भी बेटियों से नफरत कर सकती है... विश्वास नहीं होता। बहुत दुख होता है जब हम देखते हैं कि एक औरत खुद अपनी ही बेटियों से सिर्फ इसलिए नफरत करती है क्योंकि वे बेटियां हैं बेटे नहीं। उसे इतना खयाल नहीं रहता कि वह जब पैदा हुई थी तो खुद भी कन्या ही थी अगर उसके मां बाप ने उसे भी मार दिया होता तो ??
आज खबर पढी कि मुजफ्फरनगर में पति के तानों से तंग आकर एक मां ने ही अपनी जुडवा बच्चियों को तालाब के पानी में डुबोकर मार डाला। हाय राम कितनी निर्दयी होगी वो औरत जो अपनी ही संतान की हत्या अपने ही हाथों से कर गई और वो सिर्फ इसलिए कि वे बेटे नहीं बेटियां थीं। अब ऐसी औरतों को हम क्या कहें ? मानसिक रूप से विक्षिप्त भी नहीं कह सकते क्योंकि यह सब कुछ उसने पूरे होशोहवास में किया और करने के बाद दोनों बेटियों के अपहरण की रिपोर्ट भी दर्ज कराई।  बहुत दबाव के बाद उसने कबूल किया कि उसने ही खुद अपने हाथों से दोनों बेटियों को तालाब में डुबोया था । तालाब से शव भी बरामद किए गए।

इन सब तरह की घटनाओं का जिम्मेदार आखिर कौन है। क्या ये हमारे समाज की देन है जिसका एक भाग आज भी इसी गन्दी सोच से ग्रसित है कि बेटियां बोझ हैं। आखिर हम क्यों समाज की ऐसी बुराइयों को आज भी साथ लेकर चल रहे हैं। समाज हमसे है हम समाज से नहीं ।हमें समाज की उन्हीं चीजों को साथ लेकर चलना चाहिए जो मानव और मानवता के हित में हैं । मानवता का अहित करने वाली हर रूढिवादी सोच को दिमाग और समाज से निकाल फेंकने की जरूरत है और ऐसा तब होगा जब  हम शिक्षित लोग अशिक्षित लोगों को ऐसे बुरे काम करने से रोकेंगे। इसलिए अगर कहीं भी आपके आसपास कुछ ऐसा होता है जो हमारे भविष्य को नुकसान पहुंचा सकता है तो उसका खुलकर विरोध करें। आगे आएं और इंसानियत को जिंदा रखें।

क्या न्याय मांगना गुनाह है ?



भारत में महिलाओं की सुरक्षा बस नाम की रह गई है। खासकर यूपी और बिहार जैसे राज्यों में तो महिलाओं के साथ कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। कहेगा भी कौन जब सत्तारूढ़ सरकार के मंत्री विधायक ही बच्चियों की आबरू से खेलने लगें तो कानून भी अपंग हो जाता है। उन्नाव की घटना तो कुछ ऐसा साबित करती नजर आ रही है। रेप पीडिता प्रशासन को आरोपी से खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग करती है , सुरक्षा भी दी जाती है लेकिन इसके बावजूद पीडिता की गाडी का एक्सीडेंट करवा दिया जाता है । सुरक्षा मिलने के बावजूद रेप पीडिता के साथ सुरक्षा कर्मियों का न होना और उस पर फिर बीजेपी नेताओं के अटपटे बयान बहुत कुछ बयान कर जाते हैं। समझदार व्यक्ति तो सारा मामला समझ ही जाता है। 
हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि बेमतलब के मुद्दों पर बढ चढ कर बोलने वाली महिला सांसदों और विधायकों की बोली भी उस वक्त बन्द हो जाती है जब सवाल एक बेबस लाचार बलात्कार पीडिता का उठता है। वो भी तो एक महिला है और एक महिला होकर भी एक महिला का दर्द जो न समझे धिक्कार है ऐसी महिलाओं पर। एक्सीडेंट में रेप पीडिता का पूरा परिवार तहस नहस हो जाता है वो भी सिर्फ इसलिए कि उसने भारत के अन्धी न्याय व्यवस्था से न्याय मांग लिया था। क्या भारत में न्याय मांगना इतना बडा अपराध है  ?  ईश्वर न करे अगर अस्पताल में जिन्दगी और मौत से जूझती पीडिता की मौत हो जाती है तो  न्याय पाकर भी उसकी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी।
ताज्जुब होता है देखकर कि एक तरफ लोग बेटी बचाओ का नारा देकर वोट इकठ्ठा करते हैं और सत्ता में आते ही उन्हीं बेटियों को न्याय प्रदान करने से कतराने लगते हैं। आज अगर उस बच्ची को न्याय न मिला तो ये तय हो जाएगा कि सारे कानून और नियम सिर्फ आम बेबस जनता के लिए हैं, यदि आप बीजेपी के नेता हैं तो कानून आपकी मुठ्ठी में है और न्याय आपकी जेब में ।

महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं

  गलत नियत वालों को मौका और नहीं अब और नहीं महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं अब और नहीं जागो हे भारत की बेटियों अब तो नींद से जागो तुम अपनी स...

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