हम हमेशा नारी को सम्मान दिलाने की बात करते हैं और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए प्रयासरत रहते हैं । आखिर लोग बेटियों से इतनी नफरत क्यों करते हैं समझ में नहीं आता। चलिए मान लिया कि पुरुषों को बेटों की चाहत होती है जिसकी वजह से वे औरतों पर भ्रूणहत्या के लिए दबाव बनाते हैं लेकिन क्या एक औरत खुद औरत होते हुए भी बेटियों से नफरत कर सकती है... विश्वास नहीं होता। बहुत दुख होता है जब हम देखते हैं कि एक औरत खुद अपनी ही बेटियों से सिर्फ इसलिए नफरत करती है क्योंकि वे बेटियां हैं बेटे नहीं। उसे इतना खयाल नहीं रहता कि वह जब पैदा हुई थी तो खुद भी कन्या ही थी अगर उसके मां बाप ने उसे भी मार दिया होता तो ??
आज खबर पढी कि मुजफ्फरनगर में पति के तानों से तंग आकर एक मां ने ही अपनी जुडवा बच्चियों को तालाब के पानी में डुबोकर मार डाला। हाय राम कितनी निर्दयी होगी वो औरत जो अपनी ही संतान की हत्या अपने ही हाथों से कर गई और वो सिर्फ इसलिए कि वे बेटे नहीं बेटियां थीं। अब ऐसी औरतों को हम क्या कहें ? मानसिक रूप से विक्षिप्त भी नहीं कह सकते क्योंकि यह सब कुछ उसने पूरे होशोहवास में किया और करने के बाद दोनों बेटियों के अपहरण की रिपोर्ट भी दर्ज कराई। बहुत दबाव के बाद उसने कबूल किया कि उसने ही खुद अपने हाथों से दोनों बेटियों को तालाब में डुबोया था । तालाब से शव भी बरामद किए गए।
इन सब तरह की घटनाओं का जिम्मेदार आखिर कौन है। क्या ये हमारे समाज की देन है जिसका एक भाग आज भी इसी गन्दी सोच से ग्रसित है कि बेटियां बोझ हैं। आखिर हम क्यों समाज की ऐसी बुराइयों को आज भी साथ लेकर चल रहे हैं। समाज हमसे है हम समाज से नहीं ।हमें समाज की उन्हीं चीजों को साथ लेकर चलना चाहिए जो मानव और मानवता के हित में हैं । मानवता का अहित करने वाली हर रूढिवादी सोच को दिमाग और समाज से निकाल फेंकने की जरूरत है और ऐसा तब होगा जब हम शिक्षित लोग अशिक्षित लोगों को ऐसे बुरे काम करने से रोकेंगे। इसलिए अगर कहीं भी आपके आसपास कुछ ऐसा होता है जो हमारे भविष्य को नुकसान पहुंचा सकता है तो उसका खुलकर विरोध करें। आगे आएं और इंसानियत को जिंदा रखें।


