महिला सुरक्षा

हर एक महिला की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए

भाजपा सरकार में बढता बलात्कार

उत्तर प्रदेश में बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। एक के बाद एक सामने आती बलात्कार की घटनाएं यह साबित करती हैं कि हमारा प्रदेश महिलाओं के लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है।वह सरकार जो सत्ता में आते ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रयासरत नजर आ रही थी उसी के आदमी बलात्कारी निकल रहे हैं। जब सत्ता पर काबिज लोग ही अपराध करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि प्रदेश के बुरे दिन आ गए हैं। सबसे बडा ताज्जुब तो तब होता है जब सरकार के पदों पर पदासीन लोग सब कुछ जानते हुए भी अपराधी को बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

उत्तर प्रदेश में इस समय भाजपा की सरकार है और भाजपा का ही एमएलए इस समय उन्नाव घटना में मुख्य बलात्कारी है। लगभग सब कुछ खबर होने के बावजूद भी पुलिस और सरकार इस बलात्कारी एमएलए को बचाने की भरपूर कोशिश में लगी हुई थी , कितने शर्म की बात है। सरकार ऐसा सिर्फ इसलिए कर रही है ताकि उसकी पार्टी की छवि न खराब हो और वोट बैंक सलामत रहे लेकिन सिर्फ कुछ वोटों के लिए किसी बलात्कारी को पनाह देना या जनता के साथ विश्वासघात करना किसी तरह से उचित नहीं है।

अगर बलात्कारी सिर्फ इसलिए बच जाता है कि वह एक भाजपा का विधायक है या उसे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का समर्थन हासिल है तो यह हमारी न्यायपालिका पर सवाल खडा कर सकता है। बलात्कारी सिर्फ एक अपराधी होता है चाहे वह कोई भी हो । जब एक खास इंसान कोई घिनौना काम कर देता है तो उसकी खासियत वहीं पर खत्म हो जानी चाहिए और उसके साथ सिर्फ उसी तरह का सुलूक किया जाना चाहिए जैसा कि एक आम अपराधी के साथ होता है।

पापा ! बेटी हूँ इसलिए मार न देना

दकियानूसी खयालात में

आकर दुनिया की बात में

कोख में ही खंजर तुम उतार ना देना

पापा बेटी हूँ मैं इसलिए मुझे मार ना देना

आने दो बस दुनिया में पापा बोझ न बनूंगी मैं

रूखा सूखा जो भी दोगे खुशी से खा लूंगी मैं

सोचकर मेरे बारे में कुछ टेंशन मत लेना तुम

एक ही खिलौना हो तो भैया को दे देना तुम

मुझको कुछ देना ना देना तुमको सब आजादी है

प्यार से बेटी कहना मेरे लिए इतना ही काफी है

मैं नहीं कहती कि मुझको बेटे जैसा प्यार करो

मुझको जिन्दा रहने दो इतना ही उपकार करो

जनम दिया है बेटी को ये सोच के देखो हे पापा

मम्मी को अपनी नजरों से उतार ना देना

पापा बेटी हूँ मैं इसलिए मुझे मार ना देना


दकियानूसी खयालात में

आकर दुनिया की बात में

कोख में ही खंजर तुम उतार ना देना


पापा बेटी हूँ मैं इसलिए मुझे मार ना देना

भ्रूणहत्या किस श्रेणी की कायरता है

तरह तरह के कायर देखे

पूछने का अब दिल करता है

गर्भ में इक बेटी को मारना

किस श्रेणी की कायरता है

ऐ समाज मुझको तू आज

इक बात जरा खुल के समझा

तेरा ये इंसाँ मार के बेटी

बेटों पर ही क्यों मरता है

या मेरे रब तू जाने सब

फिर क्यों जुल्म ये होता है

क्या तेरा इंसान आजकल

तुझसे भी नहीं डरता है

इस धरती पर सर्वश्रेष्ठ

हम खुद को मानव कहते हैं

अपनी बच्ची की ही हत्या

अरे यह कैसी मानवता है

कूडेदान में देखता हूँ जब

नवजात बच्चियों की लाशें

आग लगा दूँ दुनिया भर को

कुछ ऐसा मन करता है


तरह तरह के कायर देखे

पूछने का अब दिल करता है

गर्भ में इक बेटी को मारना


किस श्रेणी की कायरता है

कब तक बेटियां त्याग करेंगी ?

एक बेटी जब से जन्म लेती है तभी से उसका त्याग शुरू हो जाता है। यह हमारी पुरानी सोच का असर है कि अक्सर माँ बाप बेटियों को उतनी तवज्जो नहीं देते हैं जितना कि बेटों को, लेकिन त्याग की मूर्तियां ये बेटियां कभी अपने परिवार से या माँ बाप से इस बात की शिकायत नहीं करती हैं। बात चाहे शिक्षा की हो , आजादी की हो या अन्य सुख सुविधाओं की हो बेटों की तुलना में हमेशा बेटियों को ही समझौता करना पडता है। यहां तक कि यह भी सच है कि माँ बाप के द्वारा कमाई गई सम्पत्ति में बेटियों का भी उतना ही हक होता है जितना कि बेटों का, लेकिन बेटियां कभी भी इन सम्पत्तियों पर अपना हक नहीं जताती हैं। एक तरफ जहाँ दो भाई छोटी सी सम्पत्ति के लिए भी एक दूसरे की जान के दुश्मन बन जाते हैं वहीं बहनें अपना हिस्सा भी भाइयों को सौंपकर ससुराल चली जाती हैं।

हमारी बेटियों के इतना त्याग करने के बाद भी हमारा समाज बेटियों से नफरत करता है, बेटियों को बोझ समझता है, उन्हें पैदा होने से पहले ही मार देता है यह बडे ही दुख और शर्म की बात है। आखिर क्यों हमारा समाज ऐसा है ? इस सवाल का जवाब हमें वहीं ले जाता है जहां से समाज का पहली बार निर्माण शुरू हुआ था। शायद अकेले रहने वाले इंसानों ने जब समाज बनाया तभी उसने बेटियों के हक और अधिकार सीमित कर दिए थे। चूंकि यह समाज के निर्माण के शुरुआती दिनों में हुआ था तो समय बीतने के साथ साथ इसे समाज का एक मूलभूत नियम समझा जाने लगा। इसके बाद आने वाली पीढियों ने बेटियों से आजादी छीनकर और उन्हें शिक्षा से वंचित रखकर इस नियम को इतना मजबूत बना दिया कि आज तक हमें इस पक्षपातपूर्ण नियम को बदलने के लिए जद्दोजहद करनी पड रही है।

हालांकि "शिक्षा " ने समाज के इस बडे पेड की बहुत सी शाखाओं को इस नियम से आजाद कर दिया है लेकिन कुछ शाखाएं ऐसी भी हैं जहाँ पर शिक्षा अभी तक पहुंच ही नहीं पाई है और उन शाखाओं में अब भी बेटियों के बिपक्ष में बनाया गया यह नियम ही लागू है।

बेटियों ने हमेशा पुराने समाज के नियमों के चलते अपने सपनों का बलिदान दिया है लेकिन ये समाज आखिर कब तक बेटियों से ही त्याग करवाता रहेगा । क्या बेटियों के लिए समाज अपने कुछ पुराने दकियानूसी नियमों को त्याग नहीं सकता ? बेटियों ने काफी हद तक अपने आपको सम्भालने का प्रयास किया है और जागरूक हुई हैं, शिक्षित हुईं हैं लेकिन फिर भी उन्हें हम मर्दों और समाज के सपोर्ट की जरुरत है इसलिए हमें चाहिए कि हम उनको , उनके सपनों का वो आसमान मुहैया कराएं जिसमें वो आजाद होकर उडान भर सकें और लोगों की यह सोच बदल सकें कि बेटियां बोझ नहीं होती बल्कि बेटी ईश्वर का दिया हुआ वह जरूरी और कीमती तोहफा है जिनके न होने पर इस समाज, इस मानव जाति और इस दुनिया की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।


महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं

  गलत नियत वालों को मौका और नहीं अब और नहीं महिला सुरक्षा से समझौता और नहीं अब और नहीं जागो हे भारत की बेटियों अब तो नींद से जागो तुम अपनी स...

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